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जल संकट का असंतुलित प्रबंधन: हमारी आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व पर बड़ा खतरा

जल संकट का असंतुलित प्रबंधन

पानी सिर्फ कुदरत का एक तोहफा नहीं है, बल्कि यह इंसानी सभ्यता और हमारे जीवन का सबसे बड़ा आधार है। पानी के बिना धरती पर जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

लेकिन विडम्बना देखिए, जिस पानी को हमारी संस्कृति में ‘देवता’ मानकर पूजा गया, उसी पानी के प्रति हम सबसे ज्यादा लापरवाह रहे हैं। आज भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया जिस सबसे गंभीर चुनौती से जूझ रही है, वह है—गहराता जल संकट

बढ़ती आबादी, बिना सोच-समझकर बसाए जा रहे शहर, अंधाधुंध बोरवेल खोदकर निकाला जा रहा भूजल, मौसम में बदलाव और बारिश के पानी को न बचा पाने की हमारी नाकामी ने इस संकट को बेहद डरावना बना दिया है। अगर अब भी हमारी नींद नहीं खुली, तो आने वाले समय में पानी के लिए सिर्फ परेशानियां ही नहीं होंगी, बल्कि गांवों और शहरों में आपस में संघर्ष की स्थिति बन जाएगी।

IIT गांधीनगर की रिपोर्ट: उत्तर भारत से गायब हुआ 450 घन किलोमीटर पानी

हाल ही में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) गांधीनगर के एक अध्ययन ने इस संकट की गंभीरता को सबके सामने रखा है:

एक चौंकाने वाली सच्चाई:

पिछले 20 सालों में उत्तर भारत का भूजल भंडार लगभग 450 घन किलोमीटर तक घट चुका है। यह मात्रा देश के सबसे बड़े बांधों में से एक ‘इंदिरा सागर बांध’ की कुल क्षमता से भी 37 गुना ज्यादा है।

यह आंकड़ा सिर्फ कागजी तथ्य नहीं है, बल्कि एक चेतावनी है कि जिस जमीनी पानी के भरोसे हमारे करोड़ों किसान खेती कर रहे हैं और हम-आप पी रहे हैं, वह धीरे-धीरे खत्म होने की कगार पर है।

जलवायु परिवर्तन और बारिश का घटता चक्र

इस बिगड़ते हालात के पीछे एक बड़ा कारण मौसम का बदलता मिजाज (Climate Change) है:

  • बारिश में गिरावट: आंकड़ों के मुताबिक, 1951 से 2021 के बीच मानसूनी बारिश में लगभग 8.5 प्रतिशत की कमी आई है।

  • बढ़ती गर्मी: उत्तर भारत में सर्दियों के दौरान भी तापमान पहले से ज्यादा रहने लगा है। गर्मी बढ़ने से खेतों की नमी तेजी से सूखती है, जिससे फसलों को बार-बार सींचना पड़ता है।

जब बारिश कम होती है और सिंचाई की जरूरत बढ़ती है, तो किसान सीधे भूजल पर निर्भर हो जाते हैं। नतीजा यह है कि पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और मध्य प्रदेश में पानी का स्तर हर साल कई फीट नीचे जा रहा है। सैकड़ों फीट गहरा बोरवेल खोदने के बाद भी पानी नहीं मिल रहा, गांव के हैंडपंप सूख चुके हैं और शहरों में पानी के टैंकरों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है।

खेती-किसानी की नीतियों में बदलाव है जरूरी

हमारे देश में उपलब्ध मीठे पानी का लगभग 80% हिस्सा अकेले खेती-किसानी में इस्तेमाल होता है:

  1. ज्यादा पानी वाली फसलें: धान और गन्ना जैसी फसलें उन इलाकों में भी उगाई जा रही हैं जहाँ पानी की पहले से भारी किल्लत है।

  2. सस्ते पानी की मानसिकता: मुफ्त बिजली की वजह से ट्यूबवेल दिन-रात चलते रहते हैं, जिससे लोगों को लगता है कि पानी की कोई कीमत ही नहीं है।

  3. हल क्या है? जिन क्षेत्रों में पानी कम है, वहां बाजरा, ज्वार, रागी (मोटे अनाज/मिलेट्स), दालें और कम पानी में पकने वाली फसलों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

नदियां बनीं नाले, पारंपरिक जल स्रोत हुए खत्म

जल संकट का दूसरा पहलू हमारा बढ़ता प्रदूषण है। देश की ज्यादातर नदियां फैक्ट्रियों के जहरीले कचरे और नालों की गंदगी से भर चुकी हैं।

पुराने दौर में भारत के हर गांव और शहर में तालाब, बावड़ियां, जोहड़ और कुएं हुआ करते थे। ये बारिश के पानी को रोककर जमीन के अंदर पहुंचाते थे। आधुनिक विकास की होड़ में हमने या तो इन पारंपरिक जल स्रोतों को पाट दिया या उन पर कब्जे कर लिए। अगर हम अपने पुराने तालाबों और बावड़ियों को फिर से जीवित कर लें, तो पानी की समस्या काफी हद तक हल हो सकती है।

जल संरक्षण: सरकार के साथ-साथ हमारी भी जिम्मेदारी

पानी बचाना सिर्फ सरकार का काम नहीं है, इसे हर घर का नियम बनाना होगा:

  • रेनवाटर हार्वेस्टिंग: हर नए-पुराने मकान और सरकारी-प्राइवेट इमारतों में बारिश का पानी सहेजने (Rainwater Harvesting) का सिस्टम अनिवार्य हो।

  • ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई: किसानों को टपक (ड्रिप) और फव्वारा (स्प्रिंकलर) सिंचाई तकनीक अपनाने में मदद दी जाए।

  • दैनिक जीवन में छोटी बचत: घर में नल खुला न छोड़ें, पाइप का लीकेज तुरंत ठीक कराएं और बच्चों को बचपन से पानी की कीमत समझाएं।

  • स्कूली शिक्षा: स्कूल के सिलेबस में जल संरक्षण को एक जरूरी विषय के रूप में पढ़ाया जाए।

निष्कर्ष: ‘पानी बचेगा, तभी हमारा कल बचेगा’

आज समय की मांग है कि हम पानी को असीमित समझने की भूल बंद करें। बारिश की एक-एक बूंद को जमीन के भीतर पहुंचाना और पानी का सही इस्तेमाल करना ही इस संकट का एकमात्र समाधान है।

अगर सरकार, किसान, वैज्ञानिक और आम नागरिक मिलकर इस दिशा में काम करेंगे, तो हम अपनी आने वाली पीढ़ी को एक सुरक्षित भविष्य दे पाएंगे। वरना वह दिन दूर नहीं जब पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसना हमारी सबसे बड़ी मजबूरी बन जाएगा।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1. IIT गांधीनगर की रिपोर्ट में उत्तर भारत के भूजल के बारे में क्या कहा गया है?

उत्तर: IIT गांधीनगर के अध्ययन के अनुसार, पिछले 20 वर्षों में उत्तर भारत का भूजल भंडार 450 घन किलोमीटर घट चुका है, जो भारत के सबसे बड़े इंदिरा सागर बांध की क्षमता से 37 गुना अधिक है।

Q2. भारत में पानी की सबसे ज्यादा खपत किस क्षेत्र में होती है?

उत्तर: भारत में कुल इस्तेमाल योग्य मीठे पानी का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा कृषि क्षेत्र (सिंचाई) में खपत होता है।

Q3. कम पानी में बेहतर खेती करने के लिए कौन सी सिंचाई तकनीकें उपयोगी हैं?

उत्तर: टपक सिंचाई (Drip Irrigation) और फव्वारा सिंचाई (Sprinkler Irrigation) कम पानी में फसलों को सही नमी देने और पानी बचाने की सबसे कारगर तकनीकें हैं।

Q4. आम नागरिक अपने स्तर पर पानी बचाने के लिए क्या कदम उठा सकते हैं?

उत्तर: आम नागरिक अपने घरों में रेनवाटर हार्वेस्टिंग लगवाकर, नलों और पाइपों की लीकेज ठीक कराकर, फ्लश व शावर का सीमित इस्तेमाल करके और अपने बच्चों को जल संरक्षण का महत्व सिखाकर योगदान दे सकते हैं।