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हिंद-प्रशांत में भारत का बढ़ता सामर्थ्य एवं साझेदारियाँ: वैश्विक सुरक्षा और आत्मनिर्भरता का नया अध्याय

India’s Role in Indo-Pacific

भारत आज केवल विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्था ही नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय पटल पर एक निर्णायक और उभरती हुई वैश्विक महाशक्ति के रूप में अपनी नई पहचान स्थापित कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश की विदेश नीति ने जिस आत्मविश्वास, स्पष्टता और दूरदृष्टि का परिचय दिया है, उसने वैश्विक कूटनीति की दिशा को पूरी तरह बदल दिया है।

कभी जो भारत अपनी छोटी से छोटी रक्षा आवश्यकताओं के लिए पूरी तरह से विदेशी आयात पर निर्भर था, वही भारत आज अत्याधुनिक मिसाइलों, वायु रक्षा प्रणालियों और सैन्य उपकरणों का निर्यात करने वाला एक आत्मनिर्भर और विश्वसनीय राष्ट्र बन चुका है। यह ऐतिहासिक परिवर्तन केवल एक आर्थिक उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह भारत की रणनीतिक, वैज्ञानिक, सैन्य और कूटनीतिक संप्रभुता का जीवंत प्रमाण है।

1. ‘मेक इन इंडिया’ से रक्षा निर्यात का नया स्वर्णिम युग

वर्षों तक भारत को दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक माना जाता था, लेकिन ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियानों ने इस कड़वी हकीकत को पूरी तरह बदल दिया है। आज भारत का स्वदेशी रक्षा उद्योग विश्व स्तर पर अपना लोहा मनवा रहा है:

  • वैश्विक आकर्षण: ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल, अस्त्र एयर-टू-एयर मिसाइल, आकाश वायु रक्षा प्रणाली, पिनाका रॉकेट सिस्टम और तेजस लड़ाकू विमान आज विश्व के कई देशों का भरोसा जीत रहे हैं।

  • रणनीतिक प्रभाव: आतंकवाद विरोधी अभियानों में इन स्वदेशी हथियारों की मारक क्षमता ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। यही कारण है कि इंडोनेशिया जैसा महत्वपूर्ण देश अपने सुखोई लड़ाकू विमानों के लिए भारत की ‘अस्त्र मिसाइल’ प्राप्त करने और ‘ब्रह्मोस प्रणाली’ खरीदने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

2. इंडोनेशिया और हिंद-प्रशांत का भू-राजनीतिक समीकरण

हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में इंडोनेशिया की भौगोलिक और रणनीतिक स्थिति बेहद महत्वपूर्ण है। मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) जैसे विश्व के सबसे व्यस्त और संवेदनशील समुद्री व्यापारिक मार्ग पर स्थित होने के कारण, इंडोनेशिया वैश्विक अर्थव्यवस्था की एक लाइफलाइन है।

शक्ति संतुलन: भारत और इंडोनेशिया के बीच बढ़ता रक्षा और समुद्री सहयोग केवल दो देशों के द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत नहीं करता, बल्कि पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन (Balance of Power) को एक नया आयाम देता है। समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, आतंकवाद का मुकाबला और संयुक्त सैन्य अभ्यास के माध्यम से दोनों देश क्षेत्रीय स्थिरता को मजबूत कर रहे हैं।

3. चीन का विस्तारवाद और भारत की संतुलित रणनीति

आज हिंद-प्रशांत क्षेत्र विश्व राजनीति और संघर्ष का मुख्य केंद्र बन चुका है। दक्षिण चीन सागर में चीन का बढ़ता सैन्यीकरण, छोटे देशों पर आर्थिक और सैन्य दबाव बनाने की उसकी विस्तारवादी नीति विश्व समुदाय के लिए एक गंभीर चिंता का विषय है।

इन विपरीत परिस्थितियों में भारत ने एक बेहद संतुलित, शांतिपूर्ण लेकिन अत्यंत दृढ़ रणनीति अपनाई है:

  • विकासवाद बनाम विस्तारवाद: भारत किसी भी देश के विरुद्ध युद्ध या संघर्ष नहीं चाहता, लेकिन अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों से कोई समझौता भी नहीं करता।

  • चौतरफा सुरक्षा: भारत अब केवल अपनी जमीनी सीमाओं की सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि वह समुद्री सुरक्षा (Maritime Security), अंतरिक्ष सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और आधुनिक तकनीकी युद्ध (Tech Warfare) की तैयारियों में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है।

4. सऊदी अरब और बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच सतर्कता

अंतरराष्ट्रीय राजनीति हमेशा आदर्शों से नहीं, बल्कि ठोस राष्ट्रीय हितों और शक्ति-संतुलन से संचालित होती है। वर्तमान में चीन और पाकिस्तान अपने सैन्य व आर्थिक गठजोड़ को खाड़ी देशों, विशेषकर सऊदी अरब तक विस्तार देने के प्रयासों में जुटे हैं।

भू-राजनीतिक मोर्चे वर्तमान स्थिति भारत के लिए संदेश
चीन-पाक गठजोड़ बीजिंग और रियाद के बीच बढ़ती आर्थिक और कूटनीतिक सक्रियता। भारत को खाड़ी क्षेत्र में अपने कूटनीतिक संबंधों को और अधिक प्रगाढ़ करना होगा।
सऊदी अरब का नज़रिया सऊदी अरब का मुख्य ध्यान खाड़ी क्षेत्र में ईरान के बढ़ते प्रभाव को नियंत्रित करने पर है। पाकिस्तान हर स्थिति में भारत के विरुद्ध रणनीतिक लाभ उठाने की फिराक में रहता है, जिससे सतर्क रहना जरूरी है।

ऐसे समय में भारत की सक्रिय और बहुआयामी विदेश नीति (Multi-alignment Policy) बेहद कारगर साबित हो रही है। भारत जहाँ एक तरफ अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया (क्वाड) और यूरोप के साथ रणनीतिक संबंध मजबूत कर रहा है, वहीं दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका और ‘ग्लोबल साउथ’ (Global South) की बुलंद आवाज़ बनकर उभर रहा है।

निष्कर्ष

आज की अशांत दुनिया एक ऐसे नेतृत्व की तलाश में है जो शक्ति और शांति, विकास और सुरक्षा, तकनीक और मानवता के बीच एक आदर्श संतुलन स्थापित कर सके। भारत इस भूमिका को बहुत सफलतापूर्वक निभा रहा है। हमारा रक्षा उत्पादन युद्ध भड़काने के लिए नहीं, बल्कि शांति की रक्षा और वैश्विक संतुलन स्थापित करने के लिए है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के मूल मंत्र के साथ आगे बढ़ता भारत आने वाले वर्षों में न केवल अपने ‘विकसित भारत’ के सपने को साकार करेगा, बल्कि विश्व व्यवस्था को भी अधिक सुरक्षित, संतुलित और न्यायपूर्ण दिशा प्रदान करेगा।

FAQs

Q1. हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की विदेश नीति का मुख्य उद्देश्य क्या है?

उत्तर: इस क्षेत्र में भारत का मुख्य उद्देश्य एक स्वतंत्र, खुला, समावेशी और नियम-आधारित समुद्री वातावरण सुनिश्चित करना है, जहाँ सभी देशों की संप्रभुता का सम्मान हो और व्यापारिक जहाजों का आवागमन बिना किसी देश (जैसे चीन) के आधिपत्य के सुरक्षित रहे।

Q2. ‘ब्रह्मोस’ और ‘अस्त्र’ मिसाइलों की वैश्विक मांग क्यों बढ़ रही है?

उत्तर: ब्रह्मोस दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है और अस्त्र मिसाइल हवा से हवा में मार करने वाली आधुनिकतम स्वदेशी प्रणाली है। इनकी सटीकता, विश्वसनीयता और लागत प्रभावी होने के कारण दक्षिण-पूर्व एशिया (जैसे फिलीपींस, इंडोनेशिया) के देश अपनी सुरक्षा के लिए इन्हें खरीद रहे हैं।

Q3. ग्लोबल साउथ (Global South) से क्या तात्पर्य है और इसमें भारत की क्या भूमिका है?

उत्तर: ग्लोबल साउथ से तात्पर्य दुनिया के विकासशील और कम विकसित देशों (मुख्यतः एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका) से है। भारत जी-20 और अन्य वैश्विक मंचों के माध्यम से इन देशों की आर्थिक, तकनीकी और जलवायु संबंधी समस्याओं को दुनिया के सामने मजबूती से रखकर उनके नेता के रूप में उभर रहा है।