धर्म, आस्था और हमारी गिरती नैतिकता: राम मंदिर के बहाने एक कड़वा आत्ममंथन
Corruption in Indian Society – एक ऐसा देश, जहां सदियों से धर्म को जीवन का आधार माना गया हो, वहां जब आस्था के सबसे बड़े केंद्र से ही धोखे और हेराफेरी की खबरें आएं, तो आत्मा भीतर तक कांप उठती है। यह सिर्फ एक चोरी का मामला नहीं है, बल्कि यह हमारे सामूहिक चरित्र पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न है।
दशकों का लंबा इंतजार, करोड़ों लोगों की अटूट आस्था और न जाने कितनी पीढ़ियों का त्याग—जिस राम जन्मभूमि मंदिर के संकल्प के पीछे यह सब कुछ लगा था, वहीं के सेवादारों या जिम्मेदार लोगों पर जब धन की हेराफेरी के आरोप लगते हैं, तो मन में एक तीखा सवाल उठता है: क्या हम भारतीय स्वभाव से ही इस कदर भ्रष्ट हो चुके हैं कि हम अपने आराध्य को भी नहीं बख्शते?
यह किसी सरकारी दफ्तर की घूसखोरी या किसी सड़क के ठेके में होने वाला सामान्य घोटाला नहीं है। यह सीधे ईश्वर की संपत्ति पर डाका है। एक ऐसा समाज जो रोज सुबह भगवान के सामने सिर झुकाता है, वह इतना संवेदनशून्य कैसे हो सकता है कि मर्यादा पुरुषोत्तम के घर में ही मर्यादाओं को तार-तार कर दे?
भ्रष्टाचार: कोई बाहरी बीमारी नहीं, हमारा ‘लाइफस्टाइल’
जब भी कोई घोटाला सामने आता है, तो हमारा एक तयशुदा रवैया होता है। हम कुछ लोगों को विलेन बनाते हैं, उन्हें जेल भेजते हैं, कड़ी निंदा करते हैं और फिर आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन इस सहज प्रक्रिया में हम उस असहज करने वाले सच को कालीन के नीचे छुपा देते हैं कि भारत में भ्रष्टाचार सिर्फ नेताओं या अफसरों की वजह से जिंदा नहीं है। यह इसलिए फल-फूल रहा है क्योंकि हम आम लोगों ने इसके साथ जीना सीख लिया है।
“हमने भ्रष्टाचार को एक नैतिक पाप मानना बंद कर दिया है और इसे ‘काम निकालने का हुनर’ यानी एक स्मार्ट स्किल मान लिया है।”
आज हमारे समाज का नजरिया देखिए:
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कर चोरी करने वाला बिजनेसमैन हमारे लिए ‘दिमाग वाला’ है।
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ऊपरी कमाई करने वाला सरकारी कर्मचारी ‘पूरी तरह सेटल्ड’ माना जाता है।
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अपनी बेटी के लिए दूल्हा ढूंढते वक्त माता-पिता लड़के की सैलरी से ज्यादा इस बात में दिलचस्पी लेते हैं कि उसकी ‘ऊपर की आमदनी’ कितनी है।
जब बेईमानी को सामाजिक प्रतिष्ठा मिलने लगे, तो चरित्र का पतन होना अनिवार्य है।
धर्म और नैतिकता: एक बहुत बड़ा भ्रम
हमारे समाज में एक बड़ी गलतफहमी है कि जो व्यक्ति बहुत धार्मिक है, वह बहुत ईमानदार भी होगा। हकीकत इससे कोसों दूर है। हमने धर्म को नैतिकता से पूरी तरह अलग कर दिया है।
आज की तारीख में यह एक आम परिपाटी बन चुकी है—हफ्ते भर मिलावटखोरी, कालाबाजारी या किसी गरीब का हक मारो और संडे को किसी बड़े मंदिर में एक मोटा चंदा चढ़ाकर खुद को पवित्र घोषित कर दो। मानो भगवान कोई ‘पाप-पुण्य सेटलमेंट कंपनी’ चला रहे हों, जहां मोटी घूस देकर सारे पाप धोए जा सकते हैं।
राम मंदिर के इस प्रकरण ने हमारी इसी पाखंडी सोच का पर्दाफाश किया है। जब धर्म के सबसे पवित्र आवरण के भीतर भी लोभ अपनी जगह बना ले, तो समझ जाना चाहिए कि खराबी व्यवस्था में नहीं, बल्कि इंसानी नीयत और चरित्र में है।
‘वो भी तो करते हैं’—कुतर्कों से कब तक बचेंगे?
इस मामले पर भी कुछ लोग यह दलील दे सकते हैं कि भ्रष्टाचार तो हर देश और हर धर्म में होता है। वेटिकन से लेकर बड़े-बड़े अंतरराष्ट्रीय संगठनों तक में घोटाले होते हैं। लेकिन सवाल यह है कि दूसरों की गंदगी देखकर क्या हम अपनी गंदगी को सही ठहरा सकते हैं? किसी और जगह चोरी होने से हमारे घर की चोरी कम शर्मनाक नहीं हो जाती।
इसे किसी राजनीतिक चश्मे या ‘हिंदू बनाम गैर-हिंदू’ के विवाद में उलझाना भी बेमानी होगा। इस घिनौने कृत्य में जो लोग शामिल हैं, वे कोई विदेशी आक्रमणकारी नहीं हैं। वे हमारे अपने लोग हैं, जिन्हें हमने आदर दिया, जिन पर हमने भरोसा किया।
अंधभक्ति से आगे: मजबूत सिस्टम की जरूरत
इस पूरे प्रकरण से हमें दो सबसे बड़े सबक मिलते हैं:
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अंधविश्वास से तौबा: किसी भी इंसान को इतना पवित्र या दोषमुक्त न मान लें कि उस पर नजर रखना ही बंद कर दें। मनुष्य स्वभाव से गलतियों और लालच का पुतला है।
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मजबूत ऑडिट और सिस्टम: चाहे संस्थान कितना भी धार्मिक क्यों न हो, वहां पारदर्शिता और सख्त निगरानी का एक फुलप्रूफ सिस्टम होना ही चाहिए। भरोसा अपनी जगह है, लेकिन जवाबदेही अपनी जगह।
निष्कर्ष: चरित्र ही असली धर्म है
हम हिंदुओं के लिए यह समय आत्ममंथन का है। हमने धर्म को सिर्फ जयकारों, मंत्रोच्चार, तीथर्यात्राओं और बड़े-बड़े ढांचों तक सीमित कर दिया है। लेकिन धर्म का असली मर्म प्रतीकों में नहीं, इंसान के आचरण में होता है।
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आप पैसा कैसे कमाते हैं?
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जब आपको कोई नहीं देख रहा होता, तब आपका व्यवहार कैसा होता है?
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जब गलत रास्ते पर जाना बहुत आसान हो, तब आप खुद को कैसे रोकते हैं?
अगर हमारे चरित्र में खोट है, तो चौबीस घंटे की पूजा-पाठ और बड़े-बड़े अनुष्ठान सिर्फ एक दिखावा हैं। शायद प्रभु श्री राम ने इस घटना के जरिए हमें एक इशारा दिया है—एक चेतावनी दी है कि हम केवल पत्थरों के भव्य मंदिर न बनाएं, बल्कि अपने भीतर गिरे हुए नैतिक चरित्र के मंदिर का भी जीर्णोद्धार करें।




